बेरोजगारी और गरीबी के बीच वन आंटी आशा ने लिखी हिम्मत और हौसले की दास्तां
संघर्ष का दामन थाम कर न केवल हम आगे बढ़ते हैं, बल्कि जीवन जीने के सही तरीके भी सीखते हैं। संघर्षशील जीवन जिंदगी को एक मजबूत आयाम देता हैं। ऐसी जुझारू महिला का नाम आशा बघेला, जिन्होंने तिनके तिनके जोड़कर अपना कारोबार खड़ा किया। आ जाता हजारों महिलाओं की प्रेरणा स्रोत है।
मुंबई की रहने वाली आशा बघेला एक ऐसे ही जज्बे की जीती जागती मिसाल है। जिन्होंने ज्यादा पढ़ी-लिखी ना होने के कारण समाज की रूढ़िवादी परंपराओं से जूझते हुए, साल 1990 में पति का बिजनेस पूरी तरह से ठप हो गया। बिजनेस ठप होने के बाद अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाई। बिजनेस में हुए घाटे की वजह से उनके पति मानसिक तौर पर बीमार रहने लगे और उनका शरीर पूरा सुन पड़ गया। उनके आर्थिक स्थिति का अवसर कुछ यूं पड़ा। उनके घर में खाने के भी लाले पड़ गए। ऐसी परिस्थिति में उनके प्रिय जनों ने अपने अपने घर के दरवाजे बंद कर दिया। सिर पर लाखों का कर्ज और दो बच्चों के परवरिश के चलते आशा की जिंदगी कठिनाइयों से भर गई।
,5वी तक पढ़ी आशा ने कभी बाहर की दुनिया नहीं देखी, अचानक उनके कंधों पर परिवार के भरण पोषण का भार आ पड़ा बच्चों को बैंक से स्कूल भेजने के लिए पैसे नहीं थे, जिसके बाद आशा ने अपने पति का स्कूटर सिखा और रोजाना बच्चों को स्कूल छोड़ने जाने लगी। तभी उनके पास एक पड़ोसी का आफर आया कि अपने साथ-साथ मेरे बच्चों को भी स्कूटर से इसको लेकर जाएं और साथ ही बदले में कुछ रुपये देने की बात कही।
बस यही से आशा की जिंदगी की गाड़ी चल निकली। इसके बाद आसानी वैन चलानी सीखी। वैन खरीदने के लिए आका ने लोगों से मदद मांगी। लेकिन ज्यादातर लोगों ने उनका मजाक उड़ाया। तब आशा ने निश्चय किया चलाना है। तब तक जब तक मंजिल ना मिले चाहे आंधी आए तूफान आए।
एक दिन आशा की जिंदगी में खुशियों ने दस्तक दी और एक बैंक मैनेजर ने आशा को 1 लाख का लोन दिलवाया और आशा ने लोन लिए हुए पैसे से अपनी खुद की एक वैन खरीद ली। जैसे धीरे-धीरे उनकी जिंदगी पटरी पर आ रही थी। उनके पहले से लाचार पति को दिल का दौरा पड़ा। इसके बाद अस्पताल खर्च ने परिवार को कर्ज में ढकेल दिया। घर की बिगड़ती हालत को देखते हुए आशा के बड़े बेटे ने अपनी मां का घर खर्च में हाथ बटाने के लिए पार्ट टाइम जॉब शुरू किया समासा का बेटा मात्र 12वीं कक्षा में पढ़ रहा था।
जैसे तैसे करके आर्थिक हालत सुधारनी शुरू हुई लेकिन बच्चे को पढ़ने की उम्र में काम करते देख आशा परेशान थी। आशा बघेला के जिंदगी में काफी रुकावटेंऔर तकलीफ सफलता की राहों में आती रही, फिर भी आशा ने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा और बच्चों को वैन से स्कूल छोड़ती रही। आज आशा के पास पांच मारुति वैन दो मिनी बस है। भरोसे की मिसाल बन चुकी आशा बघेला को आज हर कोई वैन आंटी के नाम से जानता है।
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